उन्नत तकनीक से करे आलू की खेती, होगा जबरदस्त मुनाफा, मिलेगा बम्पर उत्पादन

Written by Vinod Yadav

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वैसे तो आलू के अंदर कई प्रकार के पोषक तत्व पाए जाते हैं, जैसे- विटामिन सी, विटामिन बी,  फास्फोरस, कैल्शियम एवं आयरन इत्यादि। आलू के अंदर पानी की मात्रा भी बहुत अधिक मात्रा में पाई जाती है, जो हमारे शरीर के लिए बहुत लाभदायक है। सब्जी बनाने के साथ ही आलू का उपयोग कई अन्य स्वादिष्ट चीजें बनाने के लिए भी किया जाता है जैसे आलू बड़ा, समोसा, पापड़ इत्यादि

Table of Contents

आलू की खेती के लिए खेत की तैयारी एवं मिट्टी कैसी होनी चाहिए?, आलू की खेती के लिए उन्नत किस्में कौन-कौन सी हैं?, आलू की खेती के लिए मौसम एवं जलवायु कैसी होनी चाहिए?,आलू की खेती के लिए बीज की तैयारी किस तरह से करें?,आलू की खेती में बीज की बुवाई किस प्रकार से करें?,आलू की खेती में सिंचाई कैसे करें?,आलू की खेती में खाद और उर्वरक कैसे और किस मात्रा में डालें?,आलू की खेती में निराई गुड़ाई का कार्य कैसे करें?,आलू की खेती में होने वाले रोग एवं उनके रोकथाम के उपाय क्या हैं?,आलू की खेती में कटाई किस प्रकार से करें?,आलू की खेती का इतिहास क्या है?,भारत के अंदर आलू की खेती सबसे ज्यादा किस राज्य में की जाती हैं? दोस्तों यदि आपके मन में भी यह सभी सवाल है, तो आपको हमारी पोस्ट को पूरा पढ़ना है। इस पोस्ट में हम आपको मसूर की खेती को लेकर सम्पूर्ण जानकारी प्रदान करेंगे।। पोस्ट अंत तक जरूर पढ़िएगा…

आलू की खेती के लिए खेत की तैयारी

आलू की खेती के लिए सबसे पहले उचित जल निकासी वाले खेत को ढूंढ ले। इसके बाद उस खेत की तीन से चार बार अच्छे तरीके से जुताई करवा दें। और ध्यान देने योग्य बात यह है कि खेत की मिट्टी बुलई दोमट मिट्टी होनी चाहिए। खेत के अंदर जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें और आखरी जुताई सामान्य हल से की जानी चाहिए। प्रत्येक जुताई के करने के बाद खेत में पाटा जरूर चलाएं। इससे खेत समतल हो जाएगा और मिट्टी भुरभुरी हो जाएगी। इस मिट्टी में आलू के कंधों का विकास तीव्र गति से हो पाता है। खेत की मिट्टी का pH मान सामान्य होना चाहिए।

आलू की खेती के लिए उन्नत किस्में

निम्न दि गई आलु की किस्में उन्नत एवं रोगप्रतिरोधक क्षमता वाली है इन किस्मों की बुआई से आप आलु का अधिक उत्पादन कर सकते है ।

जे एच– 222 :-

जे एच- 222 आलू की संकर किस्म है, यह किस्म आलू की खेती में सर्वाधिक मात्रा में बोए जाने वाली किस्म है। इस तरह की किस्म को पककर तैयार होने में 90 से 110 दिन तक का समय लगता है। यह किस्म प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 250 से 300 कुंटल आलू का उत्पादन करती है। इस किस्म को जवाहर के नाम से भी जाना जाता है। इसकी खास बात यह है कि इस किस्म के पौधों में झुलसा रोग नहीं लगता।

लेडी रोसैट्टा :-

इस किस्म के अंदर पौधे सामान्य होते हैं और इसे पककर तैयार होने में 110 से 120 दिन का समय लगता है। इस तरह की किस्म में प्रति हेक्टर के हिसाब से लगभग 67 टन आलू का उत्पादन से हो जाता है। भारत के अंदर इस तरह की किस्म को खासतौर पर पंजाब और गुजरात राज्य में अधिक उत्पादन के लिए बोया जाता है।

कुफरी चंद्रमुखी :-

इस किस्म के पौधे 90 दिन के अंदर पक्कर तैयार हो जाते हैं। इस किस्म के अंदर जो आलू निकलते हैं, उनका रंग हल्का भूरा होता है। इस किस्म को भारत के अंदर अगेती फसल के रूप में बोया जाता है। इस किस्म की खेती के अंदर प्रति हैक्टर के हिसाब से 200 से 250 क्विंटल आलू का उत्पादन हो जाता है। इस किस्म के पौधे के अंदर पछेती अंगमारी रोग नहीं लगता है‌।

कुफरी बहार :-

आलू की इस किस्म को अगेती और पछेती दोनों के लिए उगाया जाता है। इस किस्म को अगर अगेती के रूप में बोया जाता है, तो यह किस्म 90 दिन के अंदर पक्कर तैयार हो जाती है और इस किस्म को पछेती के अंदर बोया जाता है तो यह किस्म 130 दिन के अंदर पक्कर तैयार हो जाती हैं। इस किस्म को ई 3792 के नाम से भी जाना जाता है। इस किस्म के अंतर्गत निकलने वाले आलू हल्के सफेद रंग के होते हैं।

कुफरी ज्योति :-

कुफरी ज्योति किस्म आलू की एक बेहतरीन किस्म है। इस किस्म की रोपाई के बाद 130 दिन के अंदर यह किस्म पक कर तैयार हो जाती हैं। यह किस्म में ज्यादातर पर्वतीय क्षेत्रों में बोई जाती हैं और इस किस्म को मैदानी क्षेत्रों में भी बोया जाता है मैदानी क्षेत्रों में यह किस्म लगभग 80 से 90 दिनों के अंदर पक्कर तैयारी हो जाती हैं। इस किस्म के अंतर्गत प्रति हेक्टर की दर से 150 से 200 क्विंटल आलू का उत्पादन आसानी से हो जाता है।

कुफरी ज्योति :-

इस किस्म को उगने में ज्यादा समय नहीं लगता यह जिसमें लगभग 2 से 3 महीने के अंदर पक्कर तैयार हो जाती हैं भारत के अंदर इस किस्म को महाराष्ट्र राज्य के अंदर ज्यादा मात्रा में बोया जाता है। इस किस्म के अंदर आलू का उत्पादन प्रति हेक्टेयर की दर से 250 क्विंटल तक हो जाता है। इस किस्म के अंदर आलू सफेद रंग के होते हैं।

कुफरी अशोक :-

इस किस्म को तैयार होने में लगभग 75 से 80 दिन का समय लगता है। यह किस्म मैदानी भागों में ज्यादा मात्रा में बोई जाती हैं। मैदानी भागों में बोये जाने के कारण इस किस्म के अंदर प्रति हेक्टर की दर से 270 क्विंटल आलू का उत्पादन हो जाता है।

जे. . एक्स. 166 सी. :-

आलू की यह किस्म 90 दिन के अंदर पक्कर तैयार हो जाती है यह किस्म ज्यादातर भारत के उत्तरी राज्य जैसे पंजाब हरियाणा हिमाचल प्रदेश आदि में बोई जाती हैं। इस किस्म के अंतर्गत प्रति हेक्टर की दर से 300 कुंटल आलू का उत्पादन हो जाता है।

आलू की खेती के लिए मौसम एवं जलवायु

आलू की खेती ठंड के मौसम में की जाने वाली खेती है आलू की फसल मुख्य रूप से रबी की फसल के अंतर्गत आती हैं। आलू की खेती के लिए ठंड के मौसम में दिन का तापमान 22 से 25 सेल्सियस डिग्री एवं ठंड के मौसम में रात का तापमान 15 से 18 डिग्री सेल्सियस तक होना चाहिए। आलू की खेती के लिए ठंडी जलवायु उपयुक्त मानी जाती है। ठंड के कारण आलू के कंधों का विकास होता है एवं ठंड ना होने से आलू के कंधों का विकास अवरुद्ध हो जाता है।

आलू की खेती में बीज की तैयारी

  • आलू के बीज का वजन 25 से 40 ग्राम होना चाहिए और आलू के बीज का आकार5 से 4 सेंटीमीटर तक होना चाहिए। 4 सेंटीमीटर से बड़े आकार के आलू खेती के लिए उपयुक्त नहीं माने जाते इससे किसानों का खर्च ज्यादा मात्रा में होता है एवं आर्थिक दृष्टि से भी इसे सही नहीं माना जाता। इसी के साथ ज्यादा कम आकार वाले बीज बोने से भी खेती की उपज में कमी आती है। इसलिए बीज सामान्य आकार के होने आवश्यक है।
  • आलू की खेती के लिए बीजों की बुवाई करने से पहले बीजों को एक कमरे के फर्श पर फैला देना है। कमरे के अंदर हवा उच्च मात्रा में आनी चाहिए और कमरे में धूप भी हल्की-हल्की होनी चाहिए। इस तरह के बीजो कमरे में रखने से बीज के अंकुरण क्षमता में वृद्धि होती है।
  • कमरे में रखे गए बीजों को रोजाना उलट पलट कर दें एवं जो आलू सड़ एवं गल गए हैं उनको निकाल कर फेंक दे। जिस बीज के कंद पतले और कमजोर हैं एवं जिस बीज के आंख हो उन्हें भी निकाल कर फेंक दे। क्योंकि इसके कारण आलू खराब हो जाते हैं। इसके बाद आप बीजों को बोने के लिए खेत पर ले जा सकते है।

आलू की खेती में बीज की बुवाई करना

आलू की खेती में बुवाई करने के लिए सबसे पहले आलू को छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लिया जाता है। क्योंकि आलू की बुवाई आलू के छोटे टुकड़ों के रूप में ही की जाती हैं। छोटे टुकड़ों में काट लेने के बाद इंडोफिल को पानी में घोल देना है एवं इंडोफिल के घोल में आलू के टुकड़ों को 15 मिनट तक रख देना है। इसके बाद इन टुकड़ों को गोल में से बाहर निकाल लेना है। अब आप इन आलू के टुकड़ों की रोपाई खेत में आसानी से कर सकते हैं। आलू की खेती के लिए समतल खेत का होना जरूरी है और इस समतल खेती में 1 फीट जगह को छोड़ते हुए मेड़ों का निर्माण कर लेना है। मेड़ों का निर्माण होने के बाद 20 से 25 सेंटीमीटर की दूरी पर आलू के टुकड़ों की बुवाई कर देनी है और आलू के टुकड़े की भूमि में गहराई 5 से 7 सेंटीमीटर तक होनी चाहिए।

आलू की खेती में सिंचाई का कार्य

आलू में सिंचाई की आवश्यकता होती हैं इसलिए इसे नमी वाले क्षेत्र में ही बोया जाना चाहिए। नमी वाली भूमि में आलू की बुवाई करने के 5 दिन बाद पहली सिंचाई कर देनी चाहिए। फिर इसके बाद पहली सिंचाई के 12 से 15 दिन बाद फिर से सिंचाई करनी चाहिए। आलू की खेती में लगभग 15 से 20 दिन के अंतराल में सिंचाई करते ही रहना चाहिए तभी आलू सही मात्रा में अंकुरित हो पाएंगे। आलू के खेत में आलू के पौधों में आलू का आकार बड़ा हो इसलिए खेत में हर समय नमी बनी रहनी चाहिए इसके लिए समय-समय पर सिंचाई करना बहुत आवश्यक है।

आलू की खेती में खाद और उर्वरक

आलू की जो फसल होती है वह धरती की ऊपरी सतह से ही अपना भोजन प्राप्त करती हैं। इसलिए आलू की खेती में रासायनिक खाद एवं जैविक खाद भरपूर मात्रा में डालना चाहिए। आलू की खेती में आलू की बुवाई से पहले ही 40 से 50 क्विंटल वर्मी कंपोस्ट खाद एवं 300 कुंटल तक गोबर का खाद प्रति हेक्टर की दर से डाल देने के बाद खेत की जुताई कर देनी है। इसके बाद खेत की उपजाऊ क्षमता के अनुसार 60 किलो फास्फोरस,120 किलो पोटाश एवं 150 किलो नाइट्रोजन प्रति हेक्टर की दर से डाल देना है। आलू के पौधे पर रासायनिक खाद सीधे तरीके से नहीं डालना चाहिए इससे पौधा सड़ जाता है। इसलिए इसे हमेशा पौधे से थोड़ा दूर ही डालना चाहिए।

आलू की खेती में निराई गुड़ाई

आलू की खेती में पौधे को बेहतर अंकुरण प्रदान करने के लिए प्राकृतिक एवं रासायनिक विधि के द्वारा पौधे के अलावा खेत में उग रहे अनावश्यक पौधों को हटाया जाता है। जिस प्राकृतिक विधि के द्वारा खेत में अनावश्यक पौधों को हटाया जाता है उस प्राकृतिक विधि को निराई गुड़ाई कहते हैं‌।

आलू की खेती में पहली निराई गुड़ाई आलू के बीज की बुवाई से 20 से 25 दिन बाद की जानी चाहिए। आलू की खेती में दूसरी निराई गुड़ाई पहली निराई गुड़ाई के 20 दिन बाद कर लेनी चाहिए और इसकी तीसरी निराई गुड़ाई दूसरी निराई गुड़ाई के 15 दिन बाद कर लेनी चाहिए। इस तरह से आलू की खेती में तीन बार निराई गुड़ाई आवश्यक है।

 

आलू की खेती में होने वाले रोग एवं उनके रोकथाम के उपाय

अगेती झुलसा रोग:-

यह रोंग पौधे पर बुवाई के 3 से 4 सप्ताह के बाद दिखाई देने लग जाता है। पौधे के निचले पत्तों पर दूर-दूर जो धब्बे दिखाई देते हैं वह इसी रोग के लक्षण होते हैं, जो कि बाद में कवक की गहरी हरीनली से ढक जाते हैं। यह धब्बे शुरू में गोलाकार के होते हैं और फिर बाद में धीरे-धीरे त्रिकोणीय हो जाते हैं। यह रोग नीचे की पत्तियों से होते हुए पौधे की ऊपरी पत्तियों पर भी फैल जाता है। यह रोग पौधों पर अत्यधिक तीव्र गति से फैलता है। तीव्र गति से फेलने के साथ इस रोग के धब्बों का रंग भी बदल जाता है बाद में यह धब्बे काले एवं भूरे रंग के हो जाते हैं। गर्मी के मौसम में यह धब्बे कड़े हो जाते हैं। इस रोग का प्रकोप अगर भयानक होने लग जाए तो पौधे की पत्तियां सूख कर जमीन पर गिर जाती है एवं तने पर भुरे काले रंग के धब्बे हो जाते हैं। इस रोग का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव यह है कि इस रोग का प्रभाव आलू पर भी पड़ता है एवं आलू आकार में छोटे रह जाते हैं।

रोकथाम:-

आलू के पौधों को इस रोग से बचाने के लिए आलू की खुदाई करने के बाद खेत में बच रहे अनावश्यक पौधों को इकट्ठा करके जला देना है, यह रोग एक प्रकार से भूमि जनित रोग है इसलिए इस रोग से आलू के पौधों को बचाने के लिए इस रोक को उत्पन्न करने वाले कवक के कोडीनम 12 महीने से 15 महीने तक खेत की मिट्टी में पड़े रहते हैं इसलिए फसल 2 साल के अंतराल में होना चाहिए और इस रोग से फसल को बचाने का आखिरी उपाय यह है कि फसल के अंदर यूरिया 1 फीसदी व मैंकोज़ेब (75 फीसदी) 0.2 फीसदी का छिड़काव खेत के अंदर से कर देना है।

पिछेती झुलसा रोग :-

यह रोग आलू के पौधे की पत्तियों, शाखाओं और तनो पर आक्रमण करता है। पहाड़ी इलाकों एवं मैदानी क्षेत्रों में बोई जाने वाली आलू की किस्में के पौधों के अंदर इस तरह का रोग ज्यादा मात्रा में उत्पन्न होता है। यह रोग तब उत्पन्न होता है जब बरसात अधिक मात्रा में हो और कई दिनों तक धूप ना निकले, वातावरण में नमी बनी रहे।

यह रोग पौधे के अंदर पत्तियों से शुरू होता है। पतियों से शुरू होता हुआ यह रोग पौधे के तनो और शाखाओं तक आ जाता है। यह रोग 5 दिन के अंदर पौधे की हरी पत्तियों को नष्ट कर देता है और पत्तियों पर गोल गोल धब्बे कर देता है जो कुछ दिनों बाद काले भूरे रंग के हो जाते हैं। इस रोग के कारण आलू की वृद्धि पूर्ण रूप से नहीं हो पाती एवं आलू आकार में छोटे रह जाते हैं।

रोकथाम:-

पछेती झुलसा रोग से आलू के पौधे को बचाने के लिए प्लॉटोन और बोड्रेक्स मिश्रण दोनों को मिलाकर एक घोल बना ले और इस घोल का छिड़काव पौधों पर आवश्यकतानुसार कर दें, मेटालोक्सिल नाम की एक फफूंद नाशक दवाई के 10 ग्राम मात्रा को 10 लीटर पानी के अंदर घोलकर, फिर उसमें आधे घंटे तक बीजों को डूबा कर रख देना है। इसके बाद बीजो को निकालकर छाया में सुखा देना है। बीज सूख जाने के बाद बीजों की बुवाई कर देनी है।

इस रोग से आलू के पौधे को बचाने के लिए प्रपोनेब 70 फीसदी, डाइथेन जेड 78,डाइथेन एम् 45 0.2 फीसदी,बलिटोक्स 0.25 फीसदी क्या डिफोलटान और केप्टन 0.2 फीसदी,मेटालेक्सिल 0.25 फिसदी, प्रपोनेब 70 फीसदी,मैंकोजेब (75 फीसदी) का 0.2 फीसदी,क्लोरोथलोनील 0.2 फीसदी इत्यादि प्रकार की रासायनिक दवाइयों में से किसी एक दवाई को उसकी फीसदी के हिसाब से चार से पांच बार प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव कर देना चाहिए।

आलू की खेती में कटाई/खुदाई का कार्य

आलू की फसल की कटाई नहीं की जा सकती क्योंकि यह फसल जमीन के अंदर होती है। इसलिए इसकी खुदाई की जाती है। आलू की फसल के पकने से पहले 15 या 20 दिन पहले ही खेत में सिंचाई का कार्य बंद कर देना है। 90 से 100 दिन के अंदर आलू की फसल पककर तैयार हो जाती है। आलू की खुदाई करने से 10 दिन पहले ही आलू की पत्तियों को काट देना चाहिए। जिसके कारण आलू की त्वचा मजबूत हो जाती हैं। आलू की खुदाई कर लेने के बाद आलू को किसी छायादार स्थान पर ले जाकर फैला दें इससे आलू की त्वचा में मजबूती आ जाएगी और आलू से मिट्टी सूख कर नीचे गिर जाएगी।

आलू की खेती का इतिहास

सर्वप्रथम आलू का आविष्कार दक्षिण अमेरिका के पैरू में 8००० वर्ष पहले हुआ था। परंतु आलू आज पूरे विश्व भर में खाया जाता है। आलू को भारत देश के अंदर सब्जियों का राजा भी कहा जाता है। आलू के कई प्रकार के पकवान भी बनाए जा सकते हैं। दुनिया में सबसे ज्यादा आलू चीन के अंदर उगाए जाते हैं। इसके बाद फिर दुनिया में सबसे ज्यादा आलू रूस और भारत के अंदर बोये जाते हैं। पूरी दुनिया में गेहूं, चावल और मक्का के बाद आलू की एक ऐसी सब्जी है

जो दुनिया में सबसे ज्यादा खाई जाती हैं। भारत के अंदर सर्वाधिक आलू का उत्पादन करने वाला जिला बनासनाथ है। भारत के बनास नाथ जिले के अंदर प्रतिवर्ष लगभग 17.10 लाख मीट्रिक टन आलू का उत्पादन होता है। दुनिया में सबसे महंगा एवं वैरायटी आलू ले बोनोटे (Le Bonnotte) है। इस तरह के आलू की खेती रेतीली मिट्टी पर की जाती है एवं इसमें खाद के रूप में समुद्री कवक शैवालो का उपयोग किया जाता है। दुनिया में आलू उत्पादन में संयुक्त राज्य अमेरिका चौथे स्थान पर हैं।

भारत में सबसे ज्यादा आलू की पैदावार करने वाले राज्य

भारत में सबसे ज्यादा आलू का उत्पादन उत्तर प्रदेश राज्य में किया जाता है। भारत के अंदर आलू को अत्यधिक मात्रा में खाया जाता है। भारत के अंदर उत्तर प्रदेश के बाद आलू की खेती सबसे ज्यादा पश्चिमी बंगाल और बांग्लादेश में की जाती है।

FAQ

Q1. आलू का वैज्ञानिक नाम क्या है?

Ans:- आलू का वैज्ञानिक नाम सोलनम ट्यूबरोसम (Solanum tuberosum) है।

Q2:- दुनिया में सबसे अच्छे आलू उत्पादन कौन करता है?

Ans:- दुनिया में मुख्य रूप से सबसे अच्छे आलू उत्पादन चीन और भारत करता है।

Q3. आलू की बुवाई का सही समय क्या है?

Ans:- जैसा कि आलू में दो तरह की बुआई होती हैं अगेती और पछेती। अगेती आलू की बुवाई के  सितंबर और पछेती आलू की बुवाई के लिए अक्टूबर महीने का समय उपयुक्त माना जाता है।

Q4. आलू की फसल लगभग कितने दिन में तैयार हो जाती हैं?

Ans:- आलू की फसल लगभग 85 से 90 दिन के अंदर पक्कर तैयार हो जाती है। इसके बाद आप इसकी खुदाई कर सकते हैं

Q5. भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के अंदर सबसे ज्यादा आलू उत्पादन किस जिले में होते हैं?

Ans:- भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में सबसे ज्यादा आलू उत्पादन मुजफ्फरनगर में होते हैं। मुजफ्फरनगर की 85500 हेक्टेयर की भूमि में आलू का उत्पादन किया जाता है। और अगर उत्तर प्रदेश में आलू की खेती में दूसरे स्थान की बात करें तो दूसरे स्थान पर नालंदा आता है जहां पर 20800 एक्टर की भूमि पर आलू का उत्पादन किया जाता है।

About Vinod Yadav

My name is Vinod Yadav and I am from Haryana. Although I do a job, but I am fond of writing. This blogging starts from here again. I belong to a farming family, so I have a good knowledge of agriculture. I am also an engineer in textile, so the market and plans are also taken care of. There's just one drawback. Bless you all. Hope to keep it. Jai Hind, Jai Jawan - Jai Kisan

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