चना की खेती कैसे करें, चने की टॉप किस्मे, सिंचाई, खाद की पूर्ण जानकारी

Written by Vinod Yadav

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चने को आमतौर पर छोलिया या बंगाल ग्राम के नाम से भी जाना जाता है। यह दलहन की फसल है। चने की फसल को पशुओं के चारे के रूप में एवं मनुष्य के लिए दाल एवं प्रोटीन प्रदान करने के लिए काम में ली जाती है। चने के दाने को दाल एवं बेसन बनाने में इस्तेमाल किया जाता है एवं इसकी बची हुई घास को पशुओं को चारे के रूप में दी जाती है।
चने की सबसे ज्यादा पैदावार विश्व भर में भारत,इथियोपिया, पाकिस्तान, बर्मा और टर्की आदि देशों में की जाती है।
भारत में मुख्य रूप से चने की पैदावार राज्यस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र और पंजाब में की जाती है।।
दलहन एवं बेसन की आवश्यकता के कारण चने की पेदावार अत्यधिक मात्रा में की जाती है। और इसकी आवश्यकता भी काफी ज्यादा मात्रा में है।।
आज कि इस पोस्ट में हम चने की फसल को लेकर कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां जैसे खेत की तैयारी
उन्नत किस्मे, बुवाई, खाद, बीज, निराई गुड़ाई, रोग और, उनकी रोकथाम, सिंचाई, कटाई, इतिहास, कौन से राज्य में होती है।, कितनी पैदावार होती है।, मौसम कैसा होना चाहिए आदि के बारे में संपूर्ण जानकारी प्राप्त करने वाले हैं।। इसलिए यदि आपको चने की खेती करनी है और उसमें अच्छी लागत प्राप्त करनी है। तो हमारी इस पोस्ट को पूरा पढ़ें।।

चने की खेती के लिए खेत की तैयारी

यदि आप चने की खेती करना चाहते हो, तो आपको निम्न बताई गई बातों को ध्यान में रखकर ही खेत को तैयार करना है।।

  • चने की खेती करने के लिए महीन या भुरभुरी मिट्टी की आवश्यकता नहीं होती है, इसकी खेती करने के लिए दोमट मिट्टी या मटियार मिट्टी की आवश्यकता होती है, जिससे यह फसल काफी अच्छी होती है।।
  • चने की खेती करने के लिए सबसे पहले आपको खेत में 2-3 बार जुताई करनी होगी।
    जिसमें पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से एवं दूसरी व तिसरी जुताई देसी हल से होनी चाहिए।
    भूमि को समतल करने के लिए पट्टा लगाकर जुताई करनी है। पट्टा लगाने का अच्छा फायदा यह है कि इससे नमी संरक्षित रहती है।।
  • चने की खेती करने के लिए भूमि का हल्की से भारी होना चाहिए, साथ ही भुमिं अधिक जल धारण एवं उचित जल निकास वाली रहेगी तो अच्छा होगा।
  • खेती के लिए मृदा का पीएच मान 6-7.5 होना चाहिए।। अगर आपको अपनी मृदा पीएच नहीं पता है, तो अभी किसी कृषि अधिकारी से अपनी मृदा की पीएच की जांच करवाएं, क्योंकि यह कृषि के लिए बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण होती है।।
  • यदि आपका खेत दीमक से प्रभावित है तो आपको इसके लिए क्लोरपायरीफास मिलाना चाहिए।।

चने की खेती के लिए उन्नत किस्मे

वर्तमान समय में मार्केट में चने की कई सारी किस्में उपलब्ध है, जिनमें से हम महत्वपूर्ण किस्मों के बारे में जानकारी प्राप्त करने वाले हैं। तो चलिए जानते हैं, चने की उन्नत किस्मों के बारे में।।

विशेष रुप से चने के 2 प्रकार हैं जिनमें भी अलग-अलग किस में पाई जाती है।

  • काबुली चना की डालर एवं डबल डालर किस्में – इस श्रेणी में चने के तीन किस्में पाई जाती है।

1. जे.जी.के 1

  • चने की इस किस्म को बनाने में लगभग 110 से 115 दिनों का समय लगता है। और इस किस्म से एक हेक्टर में 15 से 18 क्विंटल चने की पैदावार हो सकती है।
  • चने की इस किस्म के पौधे मध्यम लंबे होते हैं एवं कम फैलने वाले तथा बड़ी पत्तियां और सफेद फूलों वाले होते हैं इस पौधे का बीज आकार में बड़ा होता है।

2. जे.जी.के 2

  • चने की इस किस्म को बनाने में लगभग 95 से 110 दिनों का समय लगता है। और इस किस्म से एक हेक्टर में 15 से 18 क्विंटल चने की पैदावार हो सकती है।
  • चने की इस किस्म के पौधे जल्दी पकने वाले तथा बड़ी पत्तियो वाले होते हैं। इस किस्म के कम फेलाव वाले, सफेद फूलों वाले होते हैं। इस पौधे के दाने का वजन लगभग 33 ग्राम होता है और इस किस्म के पौधे में रोग काफी कम मात्रा में लगते हैं और यह जल्दी पक जाता है।

3. जे.जी.के 3

  • इस किस्म के चने के लक्षण भी अन्य किस वजह से ही होते हैं। परंतु इस किस्म के चने का बीज चिकना होता है और इसके सौ बीज का वजन लगभग 44 ग्राम होता है।

देशी चने की किस्में

बाजार में कई प्रकार की शुद्ध एवं अच्छी देषी चने की किस्में मौजूद है, यह किस्में काफी अच्छी है एवं काफी कम समय में इनकी पैदावारी की जा सकती है, इससे अधिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है।। आइए जानते हैं इसके बारे में देशी चने की अच्छी किस्मों के रूप में कुल 11 किस्में मौजूद है, जो कम समय में अधिक लागत प्रदान करती है।।

1. जे.जी. 14

  • यह किस्म 95 से 110 दिनों में बनकर तैयार हो जाती है साथ ही इस किस्म से हम एक हेक्टर में लगभग 20 से 25 क्विंटल चने की पैदावार कर सकते हैं।
  • इस किस्म का पौधा अधिक तापमान में भी सफर कर सकता है, साथ ही इस किस्म का इस्तेमाल दाल बनाने में अधिक किया जाता है इस किस्म का उपयोग मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में किया जाता है। यह देरी से भी बोई जा सकती है।।

2. जाकी 9218

  • यह किस्म लगभग 112 दिनों में बनकर तैयार हो जाती है साथ ही जाकी 9218 से हम एक हेक्टर में लगभग 18 से 20 क्विंटल चने की पैदावार कर सकते हैं।
  • इस किस्म का पौधा कम फैलाव वाला और हल्का भूरे रंग का होता है। ईसके बीज चिकनी सतह वाले होते हैं और इस किस्म के 100 दाने का वजन लगभग 27 ग्राम होता है। चने की इस किस्म का उपयोग सिंचित एवं असिंचित खेती के लिए किया जाता है।

3. जे. जी 63

  • जे. जी 63 किस्म लगभग 110-120 दिनों में बनकर तैयार हो जाती है, जे. जी 63 किस्म से हम लगभग 20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर चने की पैदावार कर सकते हैं।
  • चने की यह किस्म उकठा, कालर सड़न, सूखा, जड़ सड़न जैसे रोगों से लड़ने की क्षमता रखती है। जे. जी 63 पाड़ बोरर हेतु सहनशील किस्म है। यह किस्मत पूरे मध्यप्रदेश हेतु उपयुक्त है साथ ही इस प्रकार की किस्म में प्रचुर मात्रा में बड़ी फलियां आती है और इसका बीज पीला और बुरा तथा बड़े आकार का होता है।

4. जे. जी 412

  • जे. जी 412 किस्म का पौधा लगभग 90 से 100 दिनों में बनकर तैयार हो जाता है और यह 15 -18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की पैदावारी करता है।
  • इस किस्म की हम देरी से भी बुआई कर सकते हैं।

5. जे. जी 130

  • जे.जी 130 किस्म का पौधा हल्का फैलाव वाला होता है, जिसमें प्रचुर मात्रा में शाखाएं पाई जाती है। इस किस्म के पौधे की पत्तियां हल्की हरी होती है तथा तना बैंगनी रंग का और फूल गहरे गुलाबी रंग के होते हैं।।
  • इस किस्म के चने का बीज चिकना होता है और यह उकठा नामक रोग से लड़ने में सहायक होता है। यह किस्म असिंचित क्षेत्र में हेतु उपयुक्त है।
  • इस किस्म को पकने के लिए 100 से 120 दिनों का समय लगता है तथा यह किस्म हमें एक हेक्टर से 19 क्विंटल चने की पैदावारी करके दे सकता है।।

इसके अलावा भी कई देसी चने की प्रसिद्ध किस्में पाई जाती है। जिसकी बुवाई हम कर सकते हैं। जैसे कि- जे. जी 16, जे. जी 11, जे.जी 322, जे. जी 218, जे.जी 74, जे. जी 315 आदि। 

चने की खेती के लिए बीज

  • चने के बीज की किस्म और मात्रा चने के आकार, बुवाई का समय और भूमि की उर्वराशक्ति पर निर्भर करती है।
  • यदि आप बुवाई के लिए चने की देसी किस्म का उपयोग कर रहे हो, तो आपको 1 एकड़ के लिए 15-18 किलो बीज की बुवाई करना आवश्यक है।
  • यदि आप चने की काबुली किस्म का उपयोग कर रहे हो, तो 37 किलो प्रति एकड़ बुवाई करें।।
  • यदि आप बुवाई को धान की फसल की कटाई के बाद कर रहे हो, तो 27 किलो बीज प्रति एकड़ डालें
  • और यदि आप बीज की बुवाई दिसंबर से पहले कर रहे हो, तो 36 किलो बीज प्रति एकड़ के हिसाब से डाले।

चना की फसल के लिए मौसम कैसा होना चाहिए?

भारत में चना का उत्पादन उत्तर भारत में सबसे ज्यादा होता है। चने की खेती संरक्षित नमी वाले क्षेत्रों में की जाती है, इन क्षेत्रों में इसकी खेती काफी फायदेमंद मानी जाती है। चने की खेती के लिए फसल वाले स्थानों पर 60 से 90 सेंटीमीटर बारिश होना आवश्यक है। और यदि आप सर्द मौसम वाले क्षेत्रों में चने की खेती करते हो, तो वहां पर 24 से 30 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर कि इसकी खेती होनी चाहिए इस तापमान पर चने का पौधा अच्छे तरीके से विकसित होता है।।

चने की बुआई

चने की खेती करने के लिए बुवाई बहुत महत्वपूर्ण भाग है, सही समय पर बुवाई होने पर ही फसल अच्छे से हो पाती है। इसलिए आपको बुवाई करने के लिए निम्न बातों का ध्यान रखना आवश्यक है।।

1. बुआई

● चने की बुवाई करने से पहले आपको चने की उन्नत किस्मों के बारे में पता होना चाहिए, आप जिस मौसम में चने की बुवाई कर रहे हो उस मौसम में कौन सी किस्म सही रहेगी इसके बारे में आपको प्रयाप्त जानकारी होनी चाहिए, हमने इसके बारे में ऊपर बताया है।
● बुवाई से पूर्व बीजों के अंकुरण क्षमता की जांच अवश्य करें।
● बुवाई से पूर्व खेत पूर्व फसलों के पौधों से मुक्त होना चाहिए, जिससे फसल में अनावश्यक पौधे नहीं उगेंगे और फसल अच्छे से चलेगी।

2. बुआई का समय

● यदि आप चने की बुवाई अक्टूबर महीने में कर रहे हो, तो आपको चने की बुवाई को अक्टूबर महीने के द्वितीय सप्ताह तक करनी चाहिए।
● कई राज्यों में चने की बुवाई धान की फसल काटने के बाद की जाती है। यदि आप भी धान की फसल काटने के बाद चने की बुआई करना चाहते हो, तो आपको दिसंबर महीने के मध्य तक बुआई करनी चाहिए।
● यदि चने की बुवाई समय पर नहीं होती है, तो फसल की पैदावारी में कमी आ जाती है और फसल कई रोगों से ग्रस्त हो जाती है। इसलिए चने की बुवाई के लिए अक्टूबर महीने का पहला सप्ताह सर्वोत्तम माना जाता है।।

3. बुआई की विधि

● यदि चने की फसल की बुवाई के लिए खेत में पर्याप्त नामी मौजूद है तो सीड ड्रिल से चने की बुवाई करनी चाहिए।
● यदि खेत में बुवाई के लिए पर्याप्त नमी नहीं है तो नमी लाने के लिए बीज को अधिक गहराई में बोलना चाहिए और मशीन पर पाटा जरूर लगाएं।
● बुआई के समय पंक्तियों (कूंड़ों) के बीच की दूरी 30 सेंटीमीटर होनी चाहिए तथा पौधों के बीच की दूरी 10 सेंटीमीटर होनी चाहिए।
● यदि आप बुवाई के लिए काबुली चने की किस्म का उपयोग कर रहे हैं। तो पंक्तियों (कूंड़ों) के बीच की दूरी 45 सेंटीमीटर होनी चाहिए।
● निर्धारित समय के बाद में बुवाई करने के कारण फसल की पैदावारी में कमी आ जाती है, इसलिए सामान्य बीज दर में 20 से 25 प्रतिशत बढ़ाकर बुवाई करनी चाहिए।
● यदि आप देरी से बुवाई कर रहे हो, तो पंक्ति से पंक्ति की बीच की दूरी 25 सेंटीमीटर होनी चाहिए।

चने की खेती के लिए खाद

चने की खेती के लिए खाद एवं उर्वरकों की आवश्यकता अधिक होती है, इसलिए आपको इसका ज्यादा ध्यान रखना होगा कि खेती में कौन सा खाद डालें यदि आप प्राकृतिक खाद का इस्तेमाल कर रहे हो, तो जुताई के समय ही खेतों में डाल दें, जिससे फसल अच्छी होगी और यदि आप रसायनिक खाद का उपयोग करना चाहते हो, तो वह निम्न प्रकार है।।

  • यदि आपने अपने खेत में चने की देसी किस्म की बुवाई की है और आपका खेत सिंचित और असिंचित इलाकों में आता है, तो आपको खाद के रूप में नाइट्रोजन (urea 13 kg) और फासफोरस (Super Phosphate 50 kg) का उपयोग करना चाहिए। इस खाद की urea 13 kg और Super Phosphate 50 kg मात्रा बुवाई के समय प्रति एकड़ के हिसाब से डाले।
  • यदि आप काबुली चने की किस्म का इस्तेमाल करते हो, तो बुवाई के समय 13 किलो यूरिया और 100 किलो फास्फेट का इस्तेमाल प्रति एकड़ में कर सकते हों।

चने की फसल की निराई गुड़ाई

  • चने की फसल में कई प्रकार के हानिकारक खरपतवार लग जाते हैं, जिसके कारण फसल खराब हो जाती है इनसे बचने के लिए फसल में समय-समय पर निराई गुड़ाई करना आवश्यक है या फिर रासायनिक विधि या यांत्रिक विधि के द्वारा खरपतवार को नष्ट करना चाहिए।
  • चने की फसल में खरपतवार जैसे मोथा, प्याजी, बथुआ, मोरवा, खरतुआ, दूब आदि उगते हैं। यह खरपतवार फसलों की उपज और पैदावार को कम करते हैं।
  • इसके अलावा इन खरपतवारों के करण फसल में अनेक रोग और कीड़े लग जाते हैं।
  • फसल में उगे हानिकारक पौधों को नष्ट करने के लिए हम दो विधियों का उपयोग करते हैं।

    रासायनिक विधि

  • चने की फसल में उगी खरपतवार को नष्ट करने के लिए हम रासायनिक विधि का उपयोग करते हैं, जिसमें हम रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल खरपतवार को नष्ट करने के लिए करते हैं।
  • खरपतवार को कम करने के लिए फसल बुवाई के तुरंत पश्चात आपको Pendimethalin की 2.50 लीटर दवा को 500 लीटर पानी में घोलकर चने की फसल में छिड़काव करना चाहिए।

यांत्रिक विधि

  • यांत्रिक विधि में हम मजदूरों के द्वारा चने की फसल में नींदान (निराई) विधि से खरपतवार को नष्ट करते हैं।
  • चने की फसल में प्रथम गुड़ाई बुवाई के 1 महीने पश्चात की जाती है तथा दूसरी गुड़ाई 55 दिनों के बाद होती है।

Note:-

  • वर्तमान समय में सब कुछ चीजें आधुनिक हो रही है और किसान को भी आधुनिक होना आवश्यक है रासायनिक विधि द्वारा फसल को नुकसान पहुंचता है और आज के समय में मजदूर ना मिलने के कारण निराई गुड़ाई ज्यादा संभव नहीं है, इससे समय काफी ज्यादा खर्च होता है।
  • ऐसी स्थिति में किसान क्या करेगा, इस समस्या को देखते हुए राजस्थान राज्य के झालावाड़ जिले के रहने वाले 17 वर्षीय 12वीं के छात्र रामधन लोधा ने खरपतवार को जड़ से हटाने के लिए एक यंत्र का आविष्कार किया है।
  • इस मशीन की खासियत यह है कि यह मशीन एक साथ दो कार्य कर सकती है यह मशीन आपके फसल में उर्वरकों का छिड़काव भी करेगी, साथ ही निराई गुड़ाई भी करेगी।
  • यह मशीन चार्जेबल है और साथ ही इसे सोलर पावर द्वारा भी चला जा सकता है। शायद यह मशीन आने वाले समय में कृषि क्षेत्र में काफी बड़ा बदलाव ला सकती है। क्योंकि आज के समय में निराई गुड़ाई करने के लिए कम से कम चार से पांच मजदूरों की आवश्यकता पड़ती है, वहां यह मशीन 4 से 5 मजदूरों का काम अकेले ही कर देती है।
  • यह मशीन फसलें जैसे:- मक्का, मुंगफली, सोयाबीन, चना, भिंडी, आदि जिनकी क्यारियों के बीच 30 से 40 सेंटीमीटर की दूरी होती है उनमें खरपतवार हटाने का कार्य करती है, साथ ही पोषक तत्वों का छिड़काव करती है।

हालांकि अभी इस मशीन को मार्केट में लॉन्च नहीं किया गया है, इसे जल्द ही मार्केट में लांच किया जाएगा।।
हम इस मशीन की imege हम हमारी वेबसाइट पर नहीं दिखा सकते, क्योंकि अभी इसको पेटेंट नहीं करवाया गया है, इसकी ज्यादा जानकारी आप निम्न ईमेल से प्राप्त कर सकते हैं।।
Email – skysolarmachine@gmail.com

रोग और उनकी रोकथाम

चने की फसल में कई रोग लगते हैं, जिसके कारण चने की फसल खराब हो जाता है इनसे बचने के लिए क्या उपाय करने चाहिए और यह रोग कौन-कौन से है, आइए जानते हैं।

1. उकठा

उकठा रोग चने की फसल का एक प्रमुख रोग है, चने में यह रोग फसल में बुआई के 30 दिन से लेकर फली आने तक रहता है ।

लक्षण

  • उकठा रोग के कारण चुनें का पौधों का झुककर मुरझा जाता है।
  • जड़ में भूरी काली धारियों दिखाई देती है।

रोकथाम

● इस रोग से निपटने के लिए अच्छी किस्मों का उपयोग करना चाहिए, जो उकठा रोग से प्रभावित नहीं होती है।
● जो पौधा उकठा रोग से प्रभावित है उसे उखाडकर नष्ट करना चाहिए अथवा पौधे को गढ्ढे में दबा देना चाहिये।
● बीज में कार्बेन्डाजिम 2.5 ग्राम या फिर ट्राइकोडर्मा विरडी 4 ग्राम/किलो मिलाकर बुआई करनी चाहिए।

सिंचाई

● चने की खेती नमी वाले इलाकों में की जाती है, चने की अधिकतर खेती बारानी क्षेत्रों में की जाती है, क्योंकि यह क्षेत्र नामी वाले होते हैं और यदि किसी क्षेत्र में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है तो वहां भी चने की खेती की जा सकती है।
● सिंचाई वाले क्षेत्रों में नमी नहीं होने से चने की फसल में एक या दो सिंचाई करना आवश्यक है।

● चने की फसल में पहली सिंचाई बुवाई के 40 से 50 दिनों के बाद की जाती है तथा दूसरी सिंचाई फसल में फलिया आने के बाद की जाती है। सिंचित वाले क्षेत्रों में चने की फसल में 3 से 4 सिंचाई काफी होती है।

● फसल की गुड़ाई करने के पश्चात भी फसल में सिंचाई की जाती है तथा फसल की अंतिम सिंचाई 100 से 110 दिनों के बाद की जाती है।
● यदि आपकी फसल ऐसे इलाकों में है जहां पर सिंचाई की सुविधा कम उपलब्ध है, तो आपको बुवाई के 60 से 65 दिनों के बाद सिंचाई करनी चाहिए
● फसल में ज्यादा समय तक पानी भरा रहना सही नहीं है, इससे फसल के तने सड़ सकते हैं एवं फसल गल सकती है।

चने की फसल की कटाई

● फसल जब अच्छे से पक जाती है तो कटाई करना सही माना जाता है फसल में पर्याप्त फलियां आना आवश्यक है तभी आपको फसल की कटाई करनी चाहिए।
● यदि चने की पत्तियां और फलियां पीले भूरे रंग की हो जाती है और पौधे से पत्तियां गिरने लगती है तो आप समझ जाइए की फसल कटाई के लिए तैयार हो गई है इस स्थिति में चने का दाना सख्त हो जाता है।

● कटाई के पश्चात जब पौधा अच्छे से सूख जाए, तो थ्रेशर मशीन द्वारा दाने को और भूसे को अलग कर लेना चाहिए तथा दाने को अच्छे से सुखाकर सुरक्षित स्थान पर रख देना चाहिए।

चने का इतिहास

  • प्राचीन समय से अब तक लोग चने का इस्तेमाल दालों के लिए करते हैं तथा जिन लोगों को अच्छा स्वास्थ्य चाहिए, वह लोग चने का इस्तेमाल प्रोटीन युक्त पदार्थ के रूप में करते हैं। चना हमारी मांसपेशियों को मजबूत करता है और हमारी इम्यूनिटी को मजबूत बनाता है।
  • चना मोटापा कम करने में कारगर साबित है। चने का सेवन मानसून समय में करना सही रहता है।।
  • प्राचीन समय में चने की पैदावार मध्य पूर्व छात्रों में की जाती थी, दरअसल चने से मनुष्य की मांसपेशियां मजबूत होती है। इसलिए पहलवान और लड़ाकू लोग इसका सेवन करते हैं और प्राचीन समय से ही मध्य पूर्व छात्रों के लोग लड़ाकू माने जाते थे। इसलिए उन्होंने चने की पैदावार करना शुरू किया।
  • मध्य पूर्व छात्रों में जॉर्डन, बहरीन, ईरान, इराक, तुर्कमेनिस्तान, सीरिया, इजरायल, तुर्की, लेबनान, यूएई, यमन इत्यादि देश शामिल है।
    हालांकि मध्य पूर्वी क्षेत्रों के लोग मांसाहारी होते हैं, परंतु उन्होंने इस प्राकृतिक तत्व को भी शामिल किया जिसका नाम चना है।

चने की खेती कौन से राज्य में होती है?

चने की फसल भारत में प्रमुख दलहनी फसलों में से एक है, यह सिंचित व असिंचित क्षेत्रों की रबी की फसल है। भारत में चने की पैदावार मुख्य रूप से मध्य प्रदेश राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, गुजरात व कर्नाटक आदि राज्य में की जाती है।

चने की कितनी पैदावार होती है?

  • भारत में सबसे ज्यादा चने की पैदावार मध्यप्रदेश राज्य में की जाती है।
  • भारत देश में चने की खेती 7.54 मिलियन हेक्टर क्षेत्र में की जाती है, जिससे भारत को 7.62 क्विंटल प्रति हेक्टर की पैदावार होती है।
  • भारत को 7.62 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के औसत मान से 5.75 मिलियन टन चने की उपज प्राप्त होती है। मध्य प्रदेश राज्य के बाद
  • छत्तीसगढ़ राज्य भारत में चने का बड़ा उत्पादक देश है।
  • छत्तीसगढ़ राज्य में चने की खेती असिंचित अवस्था में की जाती है।।

Conclusion

तो दोस्तों यह थी चने की खेती को लेकर कुछ महत्वपूर्ण जानकारी, जो आज कि इस पोस्ट में हमने जानी। उम्मीद करता हूं, आपको पोस्ट पसंद आई होगी और समझ में आई होगी। इस पोस्ट में हमने चने की खेती से संबंधित संपूर्ण जानकारी प्राप्त की है। इसके अलावा यदि आप मन में और कोई प्रश्न है, तो आप हमें कमेंट करके पूछ सकते हैं। हम आपके कमेंट का जवाब देने की पूरी कोशिश करेंगे।।

 

About Vinod Yadav

My name is Vinod Yadav and I am from Haryana. Although I do a job, but I am fond of writing. This blogging starts from here again. I belong to a farming family, so I have a good knowledge of agriculture. I am also an engineer in textile, so the market and plans are also taken care of. There's just one drawback. Bless you all. Hope to keep it. Jai Hind, Jai Jawan - Jai Kisan

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